

Chapter 1 | 2 min read
बॉन्ड इश्यूएंस प्रोसेस (bond issuance process)
बॉन्ड जारी करना एक कंपनी या सरकार के लिए निवेशकों से सीधे पैसा उधार लेने जैसा है, बजाय बैंक से लेने के। सोचो एक कंपनी जैसे रिलायंस इंडस्ट्रीज अपने व्यवसाय का विस्तार करने के लिए फंड्स जुटाना चाहती है। बैंक से लोन लेने के बजाय, यह निवेशकों को बॉन्ड्स जारी करती है जो नियमित ब्याज भुगतान और मैच्योरिटी पर प्रिंसिपल रीपेमेंट के बदले पैसा उधार देने के लिए तैयार होते हैं। बॉन्ड जारी करने की प्रक्रिया (bond issuance process) इन बॉन्ड्स को मार्केट में लाने के लिए जुड़ी हुई विभिन्न चरणों की श्रृंखला है।
बॉन्ड जारी करने की प्रक्रिया क्या है? (What is the Bond Issuance Process?)
बॉन्ड जारी करने की प्रक्रिया कई चरणों में होती है, शुरुआत होती है फंड्स को बॉन्ड्स के माध्यम से जुटाने का निर्णय लेने से लेकर बॉन्ड्स को निवेशकों को बेचने और मार्केट में ट्रेड करने तक। यह प्रक्रिया पारदर्शिता, निष्पक्षता और निवेशक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विनियमित होती है।
बॉन्ड जारी करने के मुख्य चरण (Key Steps in Bond Issuance):
- बॉन्ड्स जारी करने का निर्णय (Decision to Issue Bonds): कंपनी या सरकार अपने फंडिंग की जरूरतों और मार्केट की स्थिति के आधार पर बॉन्ड जारी करने के माध्यम से पूंजी जुटाने का निर्णय लेती है।
- मध्यस्थों की नियुक्ति (Appointment of Intermediaries): इन्वेस्टमेंट बैंक्स, अंडरराइटर्स और लीगल एडवाइजर्स को इश्यू, प्राइसिंग और लीगल कंप्लायंस को मैनेज करने के लिए नियुक्त किया जाता है।
- प्रॉस्पेक्टस की ड्राफ्टिंग (Drafting the Prospectus): एक विस्तृत दस्तावेज़ तैयार किया जाता है जो बॉन्ड की शर्तों, जारीकर्ता की वित्तीय स्थिति, जोखिम और प्राप्तियों के उपयोग को दर्शाता है और इसे नियामकों के साथ फाइल किया जाता है।
- नियामक अनुमोदन (Regulatory Approval): प्रॉस्पेक्टस और इश्यून्स प्लान को SEBI जैसे नियामकों द्वारा समीक्षा और अनुमोदन किया जाता है।
- प्राइसिंग और मार्केटिंग (Pricing and Marketing): मार्केट की स्थिति, जारीकर्ता की क्रेडिटवर्दीनेस और निवेशक की मांग के आधार पर बॉन्ड्स की प्राइसिंग की जाती है। जारीकर्ता और अंडरराइटर्स संभावित निवेशकों को बॉन्ड्स मार्केट करते हैं।
- सब्सक्रिप्शन (Subscription): निवेशक इश्यून्स पीरियड के दौरान बॉन्ड्स को सब्सक्राइब करते हैं। मांग के आधार पर बॉन्ड्स ओवरसब्सक्राइब्ड या अंडरसब्सक्राइब्ड हो सकते हैं।
- आवंटन और अलॉटमेंट (Allocation and Allotment): मांग के आधार पर, बॉन्ड्स को निवेशकों को आवंटित किया जाता है और अलॉटमेंट लेटर्स जारी किए जाते हैं।
- लिस्टिंग और ट्रेडिंग (Listing and Trading): इश्यून्स के बाद, बॉन्ड्स NSE या BSE जैसे एक्सचेंजेस पर लिस्ट होते हैं, जिससे सेकेंडरी मार्केट ट्रेडिंग संभव होती है।
बॉन्ड जारी करने की प्रक्रिया SEBI विनियमों द्वारा संचालित होती है, जो निवेशक सुरक्षा सुनिश्चित करती है। LIC, NTPC, और SBI जैसी कंपनियां नियमित रूप से इस प्रक्रिया के जरिए बॉन्ड्स जारी करती हैं। RBI भी सरकारी बॉन्ड इश्यून्स को मैनेज करता है।
बॉन्ड जारी करने की प्रक्रिया को समझना निवेशकों को यह समझने में मदद करता है कि बॉन्ड्स कैसे मार्केट में आते हैं और उनके प्राइसिंग और उपलब्धता को कौन से कारक प्रभावित करते हैं। अगले अध्याय में, हम फिक्स्ड इनकम इंडिसेस (Fixed Income Indices) का अन्वेषण करेंगे, जो बॉन्ड मार्केट्स के प्रदर्शन को ट्रैक करते हैं और निवेशकों को उनके पोर्टफोलियोस (portfolios) को बेंचमार्क करने में मदद करते हैं।
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