
Chapter 3 | 3 min read
पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन (portfolio diversification) में कमोडिटीज (commodities) की भूमिका
आप एक डाइवर्सिफाइड इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो (diversified investment portfolio) बना रहे हैं — आपको स्टॉक्स (stocks), बॉन्ड्स (bonds), और रियल एस्टेट (real estate) का मिक्स चाहिए। लेकिन, क्या होता है जब स्टॉक मार्केट (stock market) एक मेजर डाउनटर्न (major downturn) का सामना करता है?
बॉन्ड्स (bonds) और रियल एस्टेट (real estate) भी नेगेटिवली प्रभावित हो सकते हैं, जिससे आपका पोर्टफोलियो (portfolio) महत्वपूर्ण नुकसान झेल सकता है।
यहां पर कमोडिटीज़ (commodities) एक क्रूशियल रोल (crucial role) प्ले कर सकती हैं। अपने पोर्टफोलियो (portfolio) में कमोडिटीज़ (commodities) जोड़कर, आप एक बफर (buffer) क्रिएट करते हैं जो ओवरऑल रिस्क (overall risk) को कम करने और रिटर्न्स (returns) के पोटेंशियल को बढ़ाने में मदद करता है।
पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन (Portfolio Diversification) क्या है?
पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन (portfolio diversification) एक इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी (investment strategy) है जो रिस्क (risk) को कम करने के लिए विभिन्न एसेट क्लासेज़ (asset classes) को मिलाती है। विचार यह है कि विभिन्न अनकोरिलेटेड एसेट्स (uncorrelated assets) को होल्ड करके, आपके पोर्टफोलियो (portfolio) की ओवरऑल वोलेटिलिटी (overall volatility) कम होगी। इस संदर्भ में, गोल्ड (gold), सिल्वर (silver), ऑइल (oil), और एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स (agricultural products) जैसी कमोडिटीज़ (commodities) डाइवर्सिफिकेशन (diversification) की एक अतिरिक्त लेयर प्रदान करती हैं।
डाइवर्सिफिकेशन (Diversification) के लिए कमोडिटीज़ (Commodities) क्यों महत्वपूर्ण हैं:
1. लो कोरिलेशन (Low Correlation) विद अदर एसेट क्लासेज़ (asset classes):
कमोडिटीज़ (commodities) अक्सर ट्रेडिशनल एसेट क्लासेज़ (traditional asset classes) जैसे स्टॉक्स (stocks) और बॉन्ड्स (bonds) के साथ लो या नेगेटिव कोरिलेशन (negative correlation) रखते हैं। इसका मतलब है कि जब स्टॉक मार्केट (stock market) गिरते हैं, तो कमोडिटीज़ (commodities) बढ़ सकती हैं, या इसके विपरीत। उदाहरण के लिए, गोल्ड (gold) अक्सर इकोनॉमिक अनसर्टेनिटी (economic uncertainty) या इन्फ्लेशन (inflation) की अवधि के दौरान अच्छा प्रदर्शन करता है, जबकि इक्विटीज़ (equities) संघर्ष कर सकती हैं।
उदाहरण:
2008 के फाइनेंशियल क्राइसिस (financial crisis) के दौरान, जब इक्विटी मार्केट्स (equity markets) ने भारी नुकसान झेले, तो गोल्ड (gold) की कीमतें बढ़ गईं क्योंकि निवेशकों ने सेफ-हेवन एसेट्स (safe-haven assets) की तलाश की, जो इसे एक उत्कृष्ट डाइवर्सिफायर (diversifier) बनाता है।
2. इन्फ्लेशन के खिलाफ हेज (Hedge Against Inflation):
कमोडिटीज़ (commodities), विशेष रूप से प्रेशियस मेटल्स (precious metals) जैसे गोल्ड (gold) और सिल्वर (silver), अक्सर इन्फ्लेशन (inflation) के खिलाफ हेज (hedge) के रूप में देखी जाती हैं। जब इन्फ्लेशन (inflation) बढ़ता है, तो पेपर करंसी (paper currency) का मूल्य गिरता है, लेकिन कमोडिटीज़ (commodities) आमतौर पर अपने मूल्य को बनाए रखते हैं या बढ़ाते हैं। यह उन्हें इन्फ्लेशनरी पीरियड्स (inflationary periods) के दौरान पर्चेज़िंग पावर (purchasing power) को प्रोटेक्ट करने के लिए एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाता है।
उदाहरण:
भारत जैसे देशों में, जहां इन्फ्लेशन रेट्स (inflation rates) वोलेटाइल (volatile) हो सकते हैं, एक डाइवर्सिफाइड पोर्टफोलियो (diversified portfolio) का हिस्सा बनकर गोल्ड (gold) में इन्वेस्टमेंट (investment) निवेशकों को इन्फ्लेशन (inflation) के इफेक्ट्स से बचा सकता है।
3. सप्लाई और डिमांड डायनामिक्स (Supply and Demand Dynamics):
कमोडिटीज़ (commodities) सप्लाई और डिमांड (supply and demand) की फोर्सेज़ से प्रभावित होती हैं। जब किसी कमोडिटी (commodity) की सप्लाई में कमी या डिमांड में वृद्धि होती है (जैसे, ऑइल (oil), व्हीट (wheat)), तो कीमतें बढ़ सकती हैं। यह कमोडिटी इन्वेस्टर्स (commodity investors) के लिए प्राइस मूवमेंट्स (price movements) से प्रॉफिट कमाने के अवसर पैदा करता है, जो इक्विटी मार्केट ट्रेंड्स (equity market trends) से स्वतंत्र हो सकता है।
उदाहरण:
2020 में, ग्लोबल ऑइल प्राइस क्रैश (global oil price crash) डिमांड में तेज गिरावट के कारण हुआ, लेकिन 2021 में, जब इकोनॉमीज़ (economies) महामारी से रिकवर होने लगीं, ऑइल की कीमतों में उछाल आया, जिससे निवेशकों को आकर्षक रिटर्न्स (returns) मिले।
4. ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ (Global Economic Growth):
कमोडिटीज़ (commodities) अक्सर ग्लोबल इकोनॉमिक एक्टिविटी (global economic activity) से सीधे जुड़ी होती हैं। उदाहरण के लिए, इंडस्ट्रियल मेटल्स (industrial metals) जैसे कॉपर (copper) और एल्यूमिनियम (aluminium) ग्लोबल इकोनॉमीज़ (global economies) के बढ़ने पर अच्छा प्रदर्शन करते हैं, जबकि एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स (agricultural products) जैसे कॉर्न (corn) और सोयाबीन (soybeans) विकासशील देशों में फूड की बढ़ती डिमांड के कारण लाभान्वित होते हैं। अपने पोर्टफोलियो (portfolio) में कमोडिटीज़ (commodities) को शामिल करने से आपको इन ग्रोथ-ड्रिवन सेक्टर्स (growth-driven sectors) के एक्सपोजर का लाभ मिलता है।
पोर्टफोलियो (Portfolio) में कमोडिटीज़ (Commodities) कैसे फिट होती हैं:
1. रिस्क रिडक्शन और वोलेटिलिटी (Risk Reduction and Volatility):
कमोडिटीज़ (commodities) अक्सर स्टॉक्स (stocks) और बॉन्ड्स (bonds) से अलग व्यवहार करती हैं, जिससे ओवरऑल पोर्टफोलियो वोलेटिलिटी (overall portfolio volatility) कम होती है। मार्केट स्ट्रेस (market stress) या इकोनॉमिक डाउनटर्न (economic downturn) के समय, गोल्ड (gold) जैसी कमोडिटीज़ (commodities) बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं, जिससे ट्रेडिशनल एसेट क्लासेज़ (traditional asset classes) में हुए नुकसान की भरपाई होती है।
2. इन्फ्लेशन प्रोटेक्शन (Inflation Protection):
कमोडिटीज़ (commodities) पोर्टफोलियो (portfolio) को इन्फ्लेशन (inflation) से प्रोटेक्ट करने के लिए सबसे प्रभावी टूल्स (tools) में से एक हैं। चूंकि वे इन्फ्लेशन (inflation) बढ़ने पर आमतौर पर मूल्य में वृद्धि करते हैं, कमोडिटीज़ (commodities) हेज (hedge) के रूप में काम कर सकती हैं, विशेष रूप से लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टर्स (long-term investors) के लिए।
3. डाइवर्सिफिकेशन स्ट्रैटेजीज़ (Diversification Strategies):
इन्वेस्टर्स (investors) अपने पोर्टफोलियो (portfolio) का एक हिस्सा कमोडिटीज़ (commodities) को अलोकेट करके या कमोडिटी-फोकस्ड ईटीएफ्स (commodity-focused ETFs) या कमोडिटी म्यूचुअल फंड्स (commodity mutual funds) में इन्वेस्ट करके डाइवर्सिफिकेशन (diversification) हासिल कर सकते हैं।
उदाहरण:
एक निवेशक जो मुख्य रूप से इक्विटी और बॉन्ड-हेवी पोर्टफोलियो (equity and bond-heavy portfolio) रखता है, वह डाइवर्सिफिकेशन (diversification) को बढ़ाने और इन्फ्लेशन (inflation) और मार्केट वोलेटिलिटी (market volatility) से प्रोटेक्शन प्रदान करने के लिए 5-10% कमोडिटीज़ (commodities) को अलोकेट कर सकता है।
विशेष रूप से भारत में, गोल्ड (gold), सिल्वर (silver), और एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स (agricultural products) का खास महत्व है। गोल्ड (gold), विशेष रूप से, मार्केट वोलेटिलिटी (market volatility) या इकोनॉमिक क्राइसिस (economic crisis) के समय सेफ हेवन (safe haven) के रूप में देखा जाता है। भारतीय निवेशकों ने ऐतिहासिक रूप से अपनी संपत्ति का एक हिस्सा फिजिकल गोल्ड (physical gold) में अलोकेट किया है, लेकिन हाल के वर्षों में, गोल्ड ईटीएफ्स (gold ETFs) और कमोडिटी म्यूचुअल फंड्स (commodity mutual funds) ने गोल्ड (gold) और अन्य कमोडिटीज़ (commodities) में इन्वेस्ट करने के लिए एक अधिक लिक्विड, कॉस्ट-इफेक्टिव तरीका प्रदान किया है।
मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (Multi Commodity Exchange - MCX) भारत में कमोडिटीज़ के ट्रेडिंग के लिए प्रमुख एक्सचेंज है, और यह प्रेशियस मेटल्स (precious metals), एनर्जी (energy), और एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स (agricultural products) सहित एक विस्तृत रेंज की कमोडिटीज़ (commodities) पर फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स (futures contracts) प्रदान करता है। कमोडिटी-लिंक्ड इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट्स (commodity-linked investment products), जैसे ईटीएफ्स (ETFs) और इंडेक्स फंड्स (index funds) के उदय ने रिटेल इन्वेस्टर्स (retail investors) के लिए अपने पोर्टफोलियो (portfolio) में कमोडिटीज़ (commodities) को शामिल करना आसान बना दिया है।
कमोडिटीज़ (commodities) पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन (portfolio diversification) के लिए एक आवश्यक टूल हैं, जो इन्फ्लेशन (inflation) और मार्केट वोलेटिलिटी (market volatility) के खिलाफ प्रोटेक्शन प्रदान करती हैं। अन्य एसेट क्लासेज़ (asset classes) के सापेक्ष कमोडिटीज़ (commodities) कैसे व्यवहार करती हैं, इसे समझकर, निवेशक उन्हें अपने पोर्टफोलियो (portfolio) में इंटिग्रेट (integrate) करने के बारे में अधिक सूचित निर्णय ले सकते हैं। अगले अध्याय में, हम गोल्ड डेरिवेटिव्स (gold derivatives) और ट्रेडिंग स्ट्रैटेजीज़ (trading strategies) में गहराई से जाएंगे, जो सबसे लोकप्रिय कमोडिटी डेरिवेटिव्स (commodity derivatives) में से एक है, और इन टूल्स का उपयोग करके गोल्ड (gold) में इन्वेस्ट (invest) करने के तरीके को एक्सप्लोर करेंगे।
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